सोमवार, 10 अगस्त 2009

नरेगा में मिल रहा है दाम लेकिन काम के नाम पर ठन ठन गोपाल




नरेगा यानि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना । गाँव की तस्वीर बदल देनेवाली इस स्कीम ने पिछडे इलाके को उर्जा से भर दिया है । कही मिटटी के टिल्ले बनाये जा रहे है तो कही खेतों की क्यारिया । कही तलावों से मिटटी निकली जा रही है । यानि काम सिर्फ़ मिटटी निकलने का हो रहा है और यह भी सच है इस सारे प्रयास को आखिरकार मिटटी में मिल जाना है । मार्च के महीने में बनने बाला यह टिल्ला जुलाई आते आते बाढ़ में बह जाना है । खेतों बनी क्यारिया में सीमेंट लगेंगे नही सो अगले सीज़न तक इसका वजूद नही रहेगा । सरकार का मानना है नरेगा से वाटर हार्वेस्टिंग की दिशा में भारी कामयाबी मिली है लेकिन उन इलाकों जहाँ कभी जल संकट रहा नही है वहां यह हार्वेस्टिंग माल महराजी का और मिर्जा खेले होली की बात को ही दर्शाती है । "मुखिया पदम् सिंह जी बताते है कि यहाँ कोई काम है नही सो कागज़ पर काम दिखाने से बेहतर है कि कुछ मिटटी ही खोद दिया जाय "।
बिहार के इस पिछडे इलाके में हर साल डैरिया से १०० से ज्यादा लोगों की मौत होती है । वजह सनिटेशन का घोर अभाव है । दूर से आती दुर्गंध हवा आपको किसी बस्ती का एहसास करा सकती है । गाँव से बाहर की सड़के मल-मूत्र से भरा पड़ा है । दिन में बच्चे की बारी होती है तो दोपहर के बाद इन सड़कों पर वयस्क मर्दों का कब्जा हो जाता है । जबकि शाम ढलते ही महिलयों की टोली यहाँ जम जाती । अपना कहने के लिए सिर्फ़ यह सड़क ही साझा शौचालय है ।
यूनिसेफ का मानना है कि गाँव में शौचालय बनाकर डैरिया की मौत से लोगों को बचाया जा सकता है । यूनिसेफ की रिपोर्ट को माने तो भारत के महज १५ फीसद गाँव में ही अबतक शौचालय लोकप्रिय हो पाया है । चौकाने वाली बात यह है कि भारत के ग्रामीण इलाके में सबसे ज्यादा मौत डैरिया से ही होती है । मुखिया पदम् सिंह इस सच को स्वीकार कर ते है लेकिन अपनी मजबूरी बताते है कि हमें सिर्फ़ मिटटी काटने को कहा गया है ।
हालिया बजट में केन्द्र सरकार ने ३९ हजार करोड़ रूपये का प्रावधान नरेगा के लिए किया है यानि पिछले साल की तुलना में १४४ फीसद की ब्रिधि दर्ज की गई है । सरकार के लिए यह फ्लाग्शिप स्कीम है जिसमे ग्रामीण रोजगार में एक क्रांति की शुरुआत हुई है । नरेगा के कारण मौजूदा सरकार भले ही अपनी वापसी देख रही हो लेकिन समाज और देश के सामने यह कोई बड़ी उप्लाभदी नही दे पायी है । मुखिया जी मानते है सनिटेशन गाँव के लिए सबसे बेहद जरूरी है फ़िर पंचायत शोचालय और कचड़ा फेकने की योजना इसमें क्यों नही शामिल करती ? मुखिया जी कहते है कि ग्राम पंचायत के पास पॉवर नही है । सरकार कहती है कि नरेगा की तमाम योजनाओं की रूप रेखा ग्राम पंचायत को तय करनी है तो सनिटेशन और स्वच्छ पानी की योजना ग्राम पंचायत क्यों नही बना रही है । ग्रामीण रामलाल के पास इसका जवाब है ७५ हजार करोड़ रूपये का ऋण सरकार एक एलान में माफ़ कर सकती है तो ४० हजार करोड़ रूपये के नरेगा को लेकर इतना माथा पच्ची क्यों । देश का पैसा देश में ही न जा रहा है ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. बकवास जी, पहले तो झण्डा सबसे उपर करिए। जय हिन्द।

    अब नरेगा। हम बहुत पहले से टिप्पणियों में चिल्लाय रहे हैं लेकिन लोग खुसुर पुसुर सुनने में ज्यादा यकीन रखते रहे। अब आप फुल फ्लेज्ड लेख ही लिख दिए हैं तो शायद आप की बकवास पर ध्यान जाए।

    रही बात गड्ढा/मिट्टी खोदने और पाटने की तो कुछ काम तो होते ही रहना चाहिए। नहीं होगा तो बिकास कैसे होगा? दारू और मुर्गा रोज शाम को चाहिए तो बिकास बहुत जरूरी है।

    और ये हगने हगाने की बात मत करिए। गन्दी बात।
    रामलाल जी का पता दीजिए उनसे प्राइबेट में बात करनी है। बहुत काम की थिउरी दिए हैं। अमर्त्य सेन के बाद अब नोबल का बल ऐसा ही कोई गुदड़ी का लाल तोड़ेगा।

    हम बकवास ज्यास्ते ही कर दिए। अब जान लीजिए कि ब्लॉग जगत में बकवास करने वाले आप अकेले नहीं हैं। हाँ SS

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  3. Bahut achha prayas hai. Bakwas report ki dunia aaj ki tarikh men bahumat men hai. aise bahut se log aur lekh hain jo umda hai lekin sampadako ke tathakathit pratibadhata ke karan bakwas ban gaye hain.
    bahut achha prayas hai. jaari rakhen.
    vidyanand acharya

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